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मथुरा में हिंसा !

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इसमें संदेह नहीं की हमारे देश में राजनीति को निजी स्वार्थों को पूरा करने का माध्यम बना दिया गया है|लेकिन यदि सता का लालच इस हद तक बढ जाये कि आप अपनी जनता की आकांक्षाओं की अपनी संकीर्ण स्वार्थों के कारण तिलांजलि दे दें| उत्तरप्रदेश के मथुरा में जो कुछ हुआ वह मानवीय-मूल्यों पर आघात था| यदि एक व्यक्ति समूचे प्रशासन को ठेंगा दिखाकर इस तरह से सार्वजानिक स्थान को हतिया सकता है, तब तो हम लोकतान्त्रिक नहीं साम्यवादी समाज में रह रहें हैं|सवाल यह पैदा होता है कि यदि एक सामान्य व्यक्ति दो वर्ष पूर्व एक बाग दो दिन कि शरण लेने आया था तो तब से लेकर वह व्यक्ति यहाँ पर कैसे रह गया ? क्यों प्रशासन की नींद तब नहीं टूटी ? उनकी जाती को देखकर यह कयास लगाये जा रहे हैं की यादव होने के कारण उन्हें सरंक्षण मिलता रहा तो यह बेहद ही शर्म की बात है, क्योंकि आप अपने पूर्वाग्रह के को सत्याग्रह के नाम से नहीं डक सकते| आम आदमी तो दूर की बात है, जिस तरह से इन गृह आतंकवादियों से सरकारी विभाग के अधिकारियों को अपनी जन बचा के भागना पड़ा इससे इस स्थिति का पता लगाया जा सकता है |लेकिन यह तथ्य गले निचे नहीं उतरता कि सरकार इससे अपरिचित थी , क्योंकि उद्यान विभाग को उस बाग़ से अपना दफ्तर हटाना पड़ा था ,बात के पश्चात् सरकार के चरित्र पर संदेह उत्पन्न होता है| उत्तर प्रदेश, सबसे हिंसात्मक राज्यों में से एक है, मुज्जफ़रनगर दंगों की रपट अभी आई थी और इकलाख वाला मुद्दा अभी सुर्ख़ियों में है, लेकिन एक और दंगे ने उत्तर प्रदेश की छवि को धूमिल कर दिया है |राजनीति में बाहुबलियों का बोलबाला होने के दुष्परिणाम भी भयंकर रूप से सामने आयें हैं आज विभिन्न राज्यों की सरकारें बाहुबलियों के बल पर चल रही हैं और इसमें कोई कारण नजर नहीँ आता की सपा ने भी इसी राह पर चलने के लिए पथ तैयार किया था ताकि वह 2017 के चुनाव में इसका लाभ ले सके, लेकिन दुर्भाग्य से सपा का बुना जाल उन्हीं के लिए कब्र बन गया | आज हमारा देश दंगों का केंद्र बनता जा रहा है | इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जाँच केंद्रीय अन्वेंष्ण ब्यूरो से करायी जनि चाइए और दोषियों पे सख्त करवाई होनी चाइये | यह कैसी विडम्बना है की महात्मा बुध, स्वामी विवेकानंद व महात्मा गांधी जैसे महान आत्माओं की धरती आज हिंसा की धरती बनती जा रही है !



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